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नेपाल-चीन BRI प्रॉजेक्ट: मिलेगी ‘सपनों’ की रेल या ड्रैगन का कर्ज-जाल?

नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

नेपाल-चीन BRI प्रॉजेक्ट: मिलेगी 'सपनों' की रेल या ड्रैगन का कर्ज-जाल?एक ओर जहां चीन और नेपाल दोनों ने भारत को लेकर तल्ख रवैया अपना रखा है, इन दोनों पड़ोसी देशों के आपस में संबंध गहरे होते जा रहे हैं। चीन नेपाल में भारत की सीमा के करीब रेलवे प्रॉजेक्ट का प्लान बना रहा है। बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के तहत 72 किमी रेलवे लाइन तिब्बत से काठमांडू होकर लुंबिनी तक जाएगी जो लुंबिनी भारतीय सीमा के करीब है। माना जा रहा है कि चीन नेपाल में भारत सीमा के करीब इसीलिए रेल लाइन बना रहे है ताकि भविष्य में भारत के साथ व्यापार में उसे आसानी से किया जा सके। इस प्रॉजेक्ट के चीन के सेक्शन पर काम कर रहे अधिकारियों के फोटो शेयर किए गए हैं। (सभी तस्वीरें: ट्विटर Shen Shiwei)

​​भारत की जगह दूसरे विकल्पों का वादा

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नेपाल सेक्शन पर स्थिति का जायजा लेने का काम जारी है। ये अधिकारी सर्वे कर रहे हैं और डिजाइन तैयार कर रह हैं। वहीं, दूसरी ओर स्थानीय लोग इस प्रॉजेक्ट को ‘कागतको रेल’ (पेपर रेल) और ‘सपनको रेल’ (सपनों की रेल) कह रहे हैं। अभी तक नेपाल व्यापार और ट्रांजिट रूट्स के लिए भारत पर निर्भर था। नेपाल का इकलौता रेल लिंक 35 किमी का ट्रैक है जिसे भारत ने बनाया है। ऐसे में चीन ने वादा किया है कि वह उसे वैकल्पिक रास्ते देगा ताकि भारत पर निर्भरता कम हो।

​​’चीन के कर्ज से सावधान रहे नेपाल’

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इसे लेकर देश के अंदर अलग-अलग तरह के विचार भी हैं। कुछ एक्सपर्ट्स इसे नेपाल के लिए अच्छा मौका देख रहे हैं जिससे वह चीन और भारत के बीच में ट्रांजिट हब बन सकेगा। वहीं, दूसरे एक्सपर्ट्स का मानना है कि नेपाल को चीन से मिलने वाले कर्ज को लेकर सावधान रहना चाहिए। छोटी अर्थव्यवस्था होने के चलते नेपाल में इस बात पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या ये कर्ज वापस किए जा सकेंगे?

​चीन की रिपोर्ट में कई रुकावटों​ का जिक्र

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चीन ने नेपाल से कनेक्टिविटी का वादा तो किया है लेकिन जिस रास्ते पर यह रेलवे प्रॉजेक्ट बनाया जाना है, वह इतना ऊबड़-खाबड़ है कि यह अपने आप में एक चुनौती है। चीन ने 2018 में एक टेक्निकल स्टडी में कई रुकावटों का जिक्र किया था। किरियॉन्ग के पास पाइकू झील जाने वाली उत्तरी और दक्षिणी ढलानों पर रैंप का निर्माण जरूरी हो गया। इसके बिना काठमांडू सेक्शन को ट्रैक से जोड़ा जाना मुश्किल था क्योंकि हिमालय के दोनों ओर ऊंचाई में काफी फर्क है।

चीन कर रहा सर्वे-

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